पत्र व्यवहार का पता

अभिव्यक्ति तुक-कोश

९. ५. २०१८

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सूर्य गगन में

 

 

क्रुद्ध हुआ है सूर्य गगन में
उष्ण हुआ धरती का मन

पेड़ सभी मिट रहे धरा से
तुनुकमिजाजी मनु बन बैठे
तनिक न चिंता जीव-जगत की
सब अपने-अपने में ऐंठे
प्रगति-पंथ ने क्या लूटा है
करना होगा यह चिंतन

क्रुद्ध हुआ है सूर्य गगन में
उष्ण हुआ धरती का मन

साल-साल दर बढ़ती जाती
सही न जाती है अब गर्मी
फिर भी कोई नहीं चेतना
मानव चित हो गया विधर्मी
स्वार्थ-सिद्धि को कंटक बोए
अब भी तो हो सही जतन

क्रुद्ध हुआ है सूर्य गगन में
उष्ण हुआ धरती का मन

ऐसे ही हालात बुरे हैं
उसपे तपकर फसल जल रही
घाव बहुत गंभीर मिलेंगे
अगर न सोचा गलत क्या सही
जीवन रह पाए धरती पर
करें समस्या का मंथन

क्रुद्ध हुआ है सूर्य गगन में
उष्ण हुआ धरती का मन

- रंजन कुमार झा

इस माह
ग्रीष्म महोत्सव के
अवसर पर

गीतों में-

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अनूप अशेष

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अश्विनी कुमार विष्णु

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आभा सक्सेना दूनवी

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कल्पना मनोरमा

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कल्पना रामानी

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कुमार रवीन्द्र

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कृष्ण भारतीय

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गरिमा सक्सेना

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चन्द्रप्रकाश पाण्डे

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देवव्रत जोशी

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देवेन्द्र सफल

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प्रदीप शुक्ल

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बसंत कुमार शर्मा

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ब्रजनाथ श्रीवास्तव

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भावना तिवारी

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मधु शुक्ला

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मलखान सिंह सिसौदिया

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मानोशी चैटर्जी

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योगेन्द्र प्रताप मौर्य

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रंजन कुमार झा

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रंजना गुप्ता

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रविशंकर मिश्र रवि

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राकेश सुमन

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राजेन्द्र वर्मा

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राहुल शिवाय

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विनोद निगम

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शशिकांत गीते

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शशि पुरवार

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शिवानंद सिंह सहयोगी

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शीलेन्द्र सिंह चौहान

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सीमा अग्रवाल

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सुरेन्द्र कुमार शर्मा

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सुरेन्द्रपाल वैद्य

छंदमुक्त में-

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अजित कुमार

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अश्विन गांधी

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मधु संधु

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शैलेष वीर

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सरस्वती माथुर

छंदों में -

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ओमप्रकाश नौटियाल

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परमजीतकौर रीत

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