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नई रचनाओं में-
उनके हुक्क भरते रहना
गम से फेरे सात करेगी
जाकर मन की गहराई में
दूर उजाले पड़ जाते हैं
सच भी कितना सच है जानें

गीतों में-
कह दो किसी और घर जाए
साहिल को अपनाना हो तो
हर दुख पर इतना भर कह ले

अंजुमन में—
अच्छा लगता है
कैद हैं साँसें
कौन जाने
चुप रहना हो
छत मैं तुम आँगन
जिंदगी के जश्न
जो वफा से
डाल हिलाकर देखो
दवा हो या ज़हर
दिन गया
दिल को बहला जाती थी
देखना चाहे इधर
दोपहर हो कि शाम
नई रंगत
पत्थरों को आइना कैसे कहूँ
पतझड़ को न देना तूल
फिर वही किस्सा पुराना
बड़ी बेजोड़ ये सौग़ात होती
भूख का मतलब
मैं चला तुम भी चलो
रात सुलाती
रोज खुले में
वक्त की दरियादिली
वक्त ने दो ग़म दिए

वही सूरत वही साया
वो टहलते वक्त
शोर भारी हो रहा है
हाथ गैरों से मिलाया

कुंडलियों में-
पाँच मौसमी कुंडलियाँ

  वक्त की दरियादिली

वक्त की दरियादिली है कल दिखाई दे न दे
वो कली जो अब खिली है कल दिखाई दे न दे.

जब कहीं आये नजर तो देख लेना गौर से
पीठ गैरत की छिली है कल दिखाई दे न दे.

घर बिखरने टूटने की हैं उधर तैयारियां
शाम को चौखट हिली है कल दिखाई दे न दे.

सच बताने के लिए जिसको बुलाया जायगा
जीभ उसकी भी सिली है कल दिखाई दे न दे

झूमती तितली महकते मुस्कुराते फूल से
आज बगिया में मिली है कल दिखाई दे न दे.

२४ मई २०१०


 

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