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अनुभूति में मदन मोहन अरविंद की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
चुप रहना हो
जो वफा से
डाल हिलाकर देखो
मैं चला तुम भी चलो
हाथ गैरों से मिलाया

गीतों में-
कह दो किसी और घर जाए
साहिल को अपनाना हो तो
हर दुख पर इतना भर कह ले

अंजुमन में—
अच्छा लगता है
कैद हैं साँसें
छत मैं तुम आँगन
जिंदगी के जश्न
दिन गया
दिल को बहला जाती थी
देखना चाहे इधर
पत्थरों को आइना कैसे कहूँ
पतझड़ को न देना तूल
बड़ी बेजोड़ ये सौग़ात होती
भूख का मतलब
रात सुलाती
रोज खुले में
वक्त की दरियादिली
वक्त ने दो ग़म दिए

वही सूरत वही साया
वो टहलते वक्त
शोर भारी हो रहा है

कुंडलियों में-
पाँच मौसमी कुंडलियाँ

  देखना चाहें इधर

देखना चाहे इधर तो मुस्करा कर देख,
फिर घड़ी भर के लिये सब कुछ भुला कर देख।

बज उठेंगे साज़, सरगम छेड़ देगी साँस
प्यार का बस एक नगमा गुनगुना कर देख।

किस कदर बेचैन रहता है अकेला चाँद,
चाँदनी में तू किसी दिन साथ आकर देख।

खुशनसीबी बिन बुलाये थाम लेगी हाथ,
मुश्किलों के बीच खुद को आज़मा कर देख।

घाव सहने का हुनर आ जाएगा तुझको,
चल किसी के घाव पर मरहम लगा कर देख।

सादगी से आ बसे सब देवता इस पार,
एक गंगा गाँव में भी है नहा कर देख।

१४ दिसंबर २००९

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