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अनुभूति में मदन मोहन अरविंद की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
चुप रहना हो
जो वफा से
डाल हिलाकर देखो
मैं चला तुम भी चलो
हाथ गैरों से मिलाया

गीतों में-
कह दो किसी और घर जाए
साहिल को अपनाना हो तो
हर दुख पर इतना भर कह ले

अंजुमन में—
अच्छा लगता है
कैद हैं साँसें
छत मैं तुम आँगन
जिंदगी के जश्न
दिन गया
दिल को बहला जाती थी
देखना चाहे इधर
पत्थरों को आइना कैसे कहूँ
पतझड़ को न देना तूल
बड़ी बेजोड़ ये सौग़ात होती
भूख का मतलब
रात सुलाती
रोज खुले में
वक्त की दरियादिली
वक्त ने दो ग़म दिए

वही सूरत वही साया
वो टहलते वक्त
शोर भारी हो रहा है

कुंडलियों में-
पाँच मौसमी कुंडलियाँ

  रात सुलाती

रात सुलाती हम सो जाते नींद कभी ऐसे भी आती
सोकर सपनों में खो जाते नींद कभी ऐसे भी आती

अपने आंगन की तस्वीरें धुंधली सी लगने से पहले
आंसू आँखों को धो जाते नींद कभी ऐसे भी आती

करते-करते बात किसी को जी भर कर अपना कर लेते
और उसी के खुद हो जाते नींद कभी ऐसे भी आती

नीचे आकर लोरी गाने और दिलों में बस जाने के
संदेसे परियों को जाते नींद कभी ऐसे भी आती

जिनसे नजरों को राहत हो वे नजरों के आगे रहते
पलकें मुंद जातीं तो जाते नींद कभी ऐसे भी आती

१८ अप्रैल २००११

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