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अनुभूति में मदन मोहन अरविंद की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
चुप रहना हो
जो वफा से
डाल हिलाकर देखो
मैं चला तुम भी चलो
हाथ गैरों से मिलाया

गीतों में-
कह दो किसी और घर जाए
साहिल को अपनाना हो तो
हर दुख पर इतना भर कह ले

अंजुमन में—
अच्छा लगता है
कैद हैं साँसें
छत मैं तुम आँगन
जिंदगी के जश्न
दिन गया
दिल को बहला जाती थी
देखना चाहे इधर
पत्थरों को आइना कैसे कहूँ
पतझड़ को न देना तूल
बड़ी बेजोड़ ये सौग़ात होती
भूख का मतलब
रात सुलाती
रोज खुले में
वक्त की दरियादिली
वक्त ने दो ग़म दिए

वही सूरत वही साया
वो टहलते वक्त
शोर भारी हो रहा है

कुंडलियों में-
पाँच मौसमी कुंडलियाँ

  दिल को बहला जाती थी

जो दिल को बहला जाती थी वो मीठी तकरार कहाँ है
कोई हम से पूछ रहा है पहले जैसा प्यार कहाँ है.

पंख नहीं फिर भी धरती से पैर नहीं लगते हैं जिसके
उसके पैरों तक जा पायें पैरों की रफ़्तार कहाँ है.

अपने शहरों तक गांवों की कोई बात नहीं आती है
सावन को कैसे समझाएं उसका मेघ-मल्हार कहाँ है.

कल को आपस में मिलजुल कर सब अपने बेगाने उसके
छुटकारे का जश्न मनाएं ऐसा भी बीमार कहाँ है.

वो दिन कब के बीत चुके जब ना के पीछे हाँ होती थी
इकरारों की खुशबू लाये अब ऐसा इनकार कहाँ है.

२४ मई २०१०

 

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