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इस नदी के घाट पर
एक देवी
कितना कठोर
महाराज विराजा
राधे राधे

गीतों में-
एक तू ही
करना होगा सृजन
कौन पढ़ेगा रे
चार दिन की जिंदगी
जिंदगी तुझको बुलाती है
गाँव जाने से
गीत नया मैं गाता हूँ
छोटी मोटी बातों मे
दिन पहाड़ से
दीप जलता रहे
नकली कवि
नदी के तीर वाले वट

बुन रही मकड़ी समय की
मन लगा महसूसने
रिश्ते नाते प्रीत के
लगे अस्मिता खोने
यह पथ मेरा चुना हुआ है
लौटकर आने लगे नवगीत
शोक-सभा का आयोजन
सगुन पाखी लौट आओ
सुबह हो रही है
हालात के मारे हुए हैं

संकलन में-
पिता की तस्वीर- चले गए बाबू जी

 

इस नदी

इस नदी के
घाट पर हम ठाठ से रम जाएँगे

इस नदी का जल हमें बेहद लुभाता है
हो न हो पिछले जनम का एक नाता है
हम नदी को
मान देकर गीत इसके गाएँगे

इस नदी की धार हमको खूब भाती है
साथ पाकर यह हमारा झूम जाती है
धार की हर बून्द
पावन है इसे सहलाएँगे

आँख में भर हम कछारों को निहारेंगे
देह नदिया की जहाँ टूटी सँवारेंगे
रूप पहले-सा
सजीला हम इसे लौटाएँगे

१ जून २०२२

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