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कोहरा ओढ़े खड़ी है
गली यह जादू भरी है
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नमस्ते हैं, मुस्कियाँ हैं
चाय की कुछ चुस्कियाँ हैं
खबर हैं सरगर्मियाँ हैं
गजब की ये सर्दियाँ हैं
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ठंड भी कसकर पड़ी है
गली गरमाहट भरी है
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टीन की छत पर नमी है
काँच पर बूँदें जमी हैं
भाप सी साँसें उड़ी हैं
खिड़कियों से आ जुड़ी हैं
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हवा उड़ने पर अड़ी है
गली उम्मीदों भरी है
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शिशिर यह कितना निडर
है
धुंध से घेरा शहर है
ठंड कुछ ऐसी जबर है
ये
रजाई बेअसर है
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बर्फ फिर शायद पड़ी है
गली सन्नाटे भरी है
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- पूर्णिमा वर्मन |