अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

            मिसरी अगहन मास

 
शीतकाल के चाप से निकल रहे हैं तीर
कुहरे की चादर पहन मौसम हुआ अधीर

ओस-ओस मोती झरे ठिठुर रही है रात
चंदा करे चकोर से भीगी- भीगी बात

देख गुलाबी धूप को भूल गये सब छाँव
धूप निखारे रूप को रूप निखारे गाँव

लुकाछिपी अब धूप की शरमा उठे गुलाब
साँझ ढले चौपाल पर बजने लगे रबाब

चखी मिठाई ईख की मन में भरी मिठास
उस पर बातें मीत की मिसरी अगहन मास

ओझल-बोझिल बर्फ़ है धरती पर चहुँ ओर
सन्नाटों के पल सभी लगे मचाने शोर

खुशबू की गठरी खुली, क्यारी- क्यारी फूल
कमसिन पछुवा भी चले, मौसम के अनुकूल

- पारुल तोमर
दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter