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            अग्निधर्मा गीत मुरझाए
 

 
बात मौसम की करें क्या है नहीं कुछ खास
जड़ बनाये दे रहा है
ठंड का अहसास

एक गर्मी थी, कहीं पर हो गई है गुम
खोजते रहते उसी को हर समय हम-तुम
कुछ न अब, कुछ भी नहीं
कुछ भी न अपने पास

थरथराहट, कंपकंपाहट ही बची है अब
देखते हैं शीत के हम अटपटे करतब
वास्तविकता और कुछ है
और कुछ आभास

चाल कुहरे की कुहासे की विकट माया
जिसे सत्तासीन होना था न हो पाया
धुंध को साम्राज्य
सूरज को मिला वनवास

सुन्न तन-मन अग्निधर्मा गीत मुरझाये
कल रहे जीवंत जो संदर्भ पथराये
हिल गई आस्था
हिले सारे अडिग विश्वास

ये हवाएं तीर-सी यह सिरफिरा मौसम
दंश ये हिम-यातना के सह रहे हैं हम
कंदरा में वास का
कब तक करें अभ्यास

और कितनी यंत्रणाएं आयेंगी हिस्से
कहाँ तक ढोते रहें इतिहास के किस्से
है शिशिर बाकी अभी तो
दूर है मधुमास 

- योगेन्द्र दत्त शर्मा
दिसंबर २०२४

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