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            तापमान गिरने लगा

 
तापमान गिरने लगा बढ़ी शीत की मार
लुकाछिपी कर धूप भी करती नित्य प्रहार

सीमा पर सैनिक डटे पारा हो यदि शून्य
हम सोते सुख चैन से वह जब चौकीदार

नहीं रजाई पास में जलते नहीं अलाव
रैन-बसेरा आस है कब देगी सरकार

मूरत पर ऊनी वसन ठिठुरा बूढ़ा गात
शीत लहर में मर गया भिक्षुक मंदिर द्वार

संबंधों में उष्णता बढ़ा रहीं संताप
प्रीति रजाई ओढ़िए लिए मनुजता सार

फंदे गिनतीं ऊँगलियॉ गपशप में थीं मग्न
काँप अकेलापन कहे दो कोई उपचार

कहीं शीत क्रीड़ा करे लिए तुहिन बौछार
रात सड़क पर सो कहीं करती नित तकरार

- अनिता सुधीर आख्या
दिसंबर २०२४

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