अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

            लगती सुहानी रात

 
जाती शरद जब अपने घर को
आती है शीत सुहानी
सूरज भी उठता है सोकर
सर्दी में कुछ देर से।

खान पान का वैभव
लेकर आती सर्दी अपने संग
गाजरगन्ना औऱ गुड़ भेली
भरती जीवन में मीठे रंग।

हूँ हूँ करती रहती सुबह
दुपहर में मिलती राहत
बीत जाता है जल्दी दिन
ठहरी रहती रात।

सवेटर शाल दुशाले मफलर
रहते दिनभर साथ
रजाईगद्दे कंबल संग
लगती सुहानी रात।

क्रोध से तपता सूरज भी
हो जाता शीतल शांत
मानों घर जंवाई कोई
कहता हो अपनी बात.।

- उर्मिला शुक्ल
दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter