अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

            प्रकृति वधूटी

 
बाँट रही है प्रकृति वधूटी हँसकर नेह प्रसाद
धूप खिली है इस आँगन में कई दिनों के बाद

सूरज ने मुँह छुपा लिया था उगी नहीं जब भोर
सबकी लगी टकटकी कबसे आसमान की ओर
बादल की सीढ़ी पर चढ़कर
लिखे कई परिवाद

बेघर होकर घूम रहे थे मौसम के सिरमौर
सुखद उर्मियों की तलाश में विहग न पाए ठौर
आवारा दिन सिकुड़ शीत से
करते थे फरियाद

सहमी कलियाँ अपना घूँघट नहीं सकीं तब खोल
घनी ओस की बूँदों ने जब बंद कर दिए बोल
सहज रश्मियाँ उनको आने
लगीं जोर से याद

बिखरी धूप थमाने आई नेह-प्रीति का पत्र
बिखर गया है स्वर्ण धरा पर यत्र-तत्र सर्वत्र
लूट रहे हैं मिलकर सारे
दिखा नही अपवाद

खुशियों की बारात चली तो चढ़ा प्रीति का रंग
स्वर्ण रश्मियाँ लगीं नाचने, उर हो गए मलंग
मन की पुस्तक पढ़कर चहका
हर्ष संग उन्माद

- प्रो. विश्वम्भर शुक्ल
दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter