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           धूप तुम्हारे नाम करूँ

 
कोहरा ओढ़े खड़ी हो कब से
ठिठुरी ठिठकी पड़ी हो जब से
मन कहता इक काम करूँ
आ धूप तुम्हारे नाम करूँ

अल्हड़ चंचल हुई हवाएँ
जंगल पर्वत घात करें
तिरछे पैने पंख लगा कर
डाल- पात उत्पात करें
जी चाहे अब रोकूँ इनको
बाँधूँ, दूर दराज़ धरूँ

माघ पौष कितने निर्मोही
बर्फ़ की चादर तान खड़े
काँप रहे हैं जंगल पर्वत
हाथ बाँध दिनमान खड़े
जेठ माह की गठरी खोलूँ
ढूँढूँ, कोई निदान करूँ
फिर धूप तुम्हारे नाम करूँ

किरन डोर का बुनूँ दोशाला
शाम ढले ओढाऊँगा
नेह प्रीति की आँच जला कर
द्वार तेरे धर जाऊँगा
अस्ताचल से रंग सिंदूरी
लाऊँ, तेरी माँग भरूँ
आ धूप तुम्हारे नाम करूँ

- शशि पाधा
दिसंबर २०२४

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