अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

            सर्दी की हड़ताल

 
कुछ दिन से करते नहीं, सूर्य जाँच-पड़ताल
नित्य बढ़ रही इन दिनों, सर्दी की हड़ताल

कुहरे के आगे हुए, सूर्यदेव जब फेल
बिना सूर्य दर्शन किए, लौटी दिन की रेल

कुहरे में डूबी रही, पूरे दिन आवाम
धूप-वधू आई नहीं, दिन हो गया तमाम

सूरज को है आजकल, इसी बात की टीस
हुई शीत के सामने, धूप-वधू उन्नीस

काँप रहीं किरनें सभी, धूप मनाती शोक
कुहरे में गुम हो गया, सूरज का आलोक

होठों पर तिरने लगे, कंपकपियों के गीत
गौने की दुल्हन बनी, धूप-वधू की प्रीत

शीत लगन की चूनरी, गौन-वधू है धूप
कुहरे में है छिप गया, प्रकृति-वधु का रूप

खटमिट्ठे दिन में सुने, रात ओस का गीत
शरद चाँदनी कह रही, दस्तक देती शीत

- सत्यशील राम त्रिपाठी
दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter