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सर्दी की हड़ताल |
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कुछ दिन से करते नहीं, सूर्य
जाँच-पड़ताल
नित्य बढ़ रही इन दिनों, सर्दी की हड़ताल
कुहरे के आगे हुए, सूर्यदेव जब फेल
बिना सूर्य दर्शन किए, लौटी दिन की रेल
कुहरे में डूबी रही, पूरे दिन आवाम
धूप-वधू आई नहीं, दिन हो गया तमाम
सूरज को है आजकल, इसी बात की टीस
हुई शीत के सामने, धूप-वधू उन्नीस
काँप रहीं किरनें सभी, धूप मनाती शोक
कुहरे में गुम हो गया, सूरज का आलोक
होठों पर तिरने लगे, कंपकपियों के गीत
गौने की दुल्हन बनी, धूप-वधू की प्रीत
शीत लगन की चूनरी, गौन-वधू है धूप
कुहरे में है छिप गया, प्रकृति-वधु का रूप
खटमिट्ठे दिन में सुने, रात ओस का गीत
शरद चाँदनी कह रही, दस्तक देती शीत
- सत्यशील राम त्रिपाठी
१ दिसंबर २०२४ |
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