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            कुछ दोहे सर्दी के

 
सर्दी में भी हँस रहे, ये गुलाब के फूल
जो सब को प्रतिकूल है, इनको है अनुकूल

सरसों शैशव में मुदित, होती ईख जवान
गेंहूँ तो हरिया रहे, बोरे में हैं धान

गेंदे की पसरी हुई, है मदमाती गंध।
गुपचुप उसका हो गया, सूरज से अनुबंध

जाड़ा आ सम्मुख खड़ा, ठोके अपनी ताल
आग पकड़ने से डरे, अब कमजोर पुआल

शकरकंद इठला रही, परी न जब तक आँच
अकड़ हुई ढीली तभी, बाहर आया साँच

गाजर, मूली की तरह, गोभी भी भरपूर
पालक, मेंथी घूरते, बैठ किचन में दूर

मौसम के अनुसार ही, बदला अपना रूप
धूप बैठकर धूप में, पीती देखो सूप!

बड़े अनमने हो खड़ा, सूरज रथ को थाम
कुहरे ने उसके किए, सारे रस्ते जाम

- रामेश्वर प्रसाद सारस्वत
दिसंबर २०२४

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