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           कुछ न भाता है

 
सुई गडा़ता है रह-रह कर हाड़ कँपाता है
आसों का जाड़ा सूरज को
आँख दिखाता है

हवा चले उन्चास वेगवत, रश्मिरथी बेहाल
चिड़ियों की चहकार खो गई, दांत बजे बेताल
संगी-साथी नहीं दीखते,
नात न आता है

कोने दुबकी रही रजाई, गद्दा भी सिकुड़ा
भीतर काँप रहे बापू का, बेबस सा मुखड़ा
कंबल आया नहीं जेब से
कैसा नाता है

पिछले साल से पत्नी का स्वेटर मुख ताक रहा
फीस, दवाई का खर्चा औकात को आँक रहा
चाय पी गया एक सिलेंडर
कुछ न भाता है

- विजय सिंह
दिसंबर २०२४

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