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जाड़े की चुटकी |
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जाड़े ने ली चुटकियाँ, सुन
रे मित्र गरीब
मैं औरों से दूर हूँ, तेरे बहुत करीब
क्या जाने सूरज यहाँ, कड़क ठंड का हाल
जिसने ओढ़ी जन्म से, स्वर्ण-मृगी की खाल
कोहरा भी करने लगा, राजनीति सा खेल
जाड़ा,गाँव,गरीब का, गठबन्धन बेमेल
हुई समर्थन वापसी, टूटे सभी करार
चारों खाने चित्त है, सूरज की सरकार
आवागमन समेटकर, शहर हो गये मौन
गाँव बटुरकर सो गये, इन्हें जगाये कौन
धुंध, धूल-धक्कड़, धुआँ, बर्फीले तूफान
हाँड़ कँपाने के लिए, बड़े कुटिल अभियान
सूरज हारेगा नहीं, एक अटल विश्वास
उसके उगने मात्र से, है दिन का आभास
सूरज ने दर्शन दिये, जी हो गया निहाल
कविता छत पर चढ़ गयी, फेंक शिल्प का शाल
नये साल के सूर्य ने, दिया नया सन्देश
तन-मन से त्यागी बनो, गढ़ो नया परिवेश
- उमा प्रसाद लोधी
१ दिसंबर २०२४ |
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