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            अगहन की रातें

 
शीतलता की चादर ओढ़े साँझ ढले
धीरे धीरे उतर रही हैं अगहन की रातें
कुछ अलसायी भरमाई-सी गुमसुम-सी
अंधियारे में सिहर रही हैं अगहन की रातें

गर्म रोटियाँ सिलबट्टे की खट्मिटठी चटनी
स्वाद भरे हाथों की रसोईं नानी की कहनी
नींद भरी आँखों में सजती अगहन की रातें
सुख के सपने देख रही हैं अगहन की रातें

धुआँ उठाती आग बोरसी, ताप नहीं देती
ओढा रजाई बच्चों को पर अम्मा खुद कँपती
कट जाते हैं दुख के पल छिन रात नहीं कटती
मृगछौने सी ताक रही हैं अगहन की रातें

जाने किसकी बाट जोहती खेतों में फसलें
शीत घटे और ताप बढे, तो मौसम कुछ बदले
सुखद भोर की आस लिए यह दुख की रैन ढले
सन्नाटे में ठिठुर रही हैं अगहन की रातें

- पद्मा मिश्रा
दिसंबर २०२४

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