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            ठिठुरती रात
 

 
ठिठुरती रात न रजाई न कंबल
एक फटी कथड़ी को ओढ बेसुध सो रहा है
न पलंग न गद्दा न कमरा उसके पास है
खुरदुरी जमीन पर सिर्फ फुटपाथ है

वातानुकूलित कमरों में सोने वालों को
नींद की गोलियाँ खाकर भी नींद नहीं आती है
चिंता अवसाद में रात करवटों में कट जाती है

किंतु वह दिन भर
थक-हार-कर सूखी रोटियाँ खाता है
पानी पीकर
डकार लेकर, कथड़ी ओढ़ कर सो जाता है
सर्दी का मौसम हो या दहकती रात
मच्छरों की भिन भिनाहट
हो या खटमलों का हो साथ
उसकी नींद और चैन को
कोई नहीं छीन सकता है

चिंता के नाम पर उसके पास सिर्फ पेट है
अपनी मेहनत से इतना तो कमा सकता है
पेटभर रोटी खाकर
सुख की नींद सो सकता है।

- संजय सुजय बासल
दिसंबर २०२४

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