अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

           धूप स्वेटर पहन कर आई

 
हवाओं में घुल रही ठिठुरन
धूप स्वेटर पहनकर आई

ओस ने गीला किया लो फूलों का तन
कँपकँपी के पाँव ने जकड़ा है तन-मन
शिराओं में
दौड़ती सिहरन
धुँध कुहरे को पकड़ लाई

खेत में फैली ख़ुशी अँकुराए हैं दिन
मेंड़ कहती कान में धरती बनी दुल्हन
मचानों पर
बैठ अपनापन
फूँकता है सगुन शहनाई

नदी बैठी घाट पर सुड़कती है चाय
रात लेकर चाँद को कहे टाटा बाय
कुनकुनी-सी
सूरज की किरन
चुभ रही काँटे सी पुरवाई

- जयप्रकाश श्रीवास्तव
दिसंबर २०२४

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter