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अनुभूति में शंभु शरण मंडल की रचनाएँ— 

नये गीतों में-
ओ फागुन के मीत
खोलें मन की गठरी कैसे
दिल मेरा बिन बात बसंती
फेंको अपना जाल मछेरा
बरसाने का हाल

गीतों में-
अपनी डफली अपने राग
एक सुबह फिर आई
ऐसे भी कुछ पल
चलो बचाएँ धरती अपनी
ज्योति की खुशी
झूठी झूठी हरियाली
डोर वतन की हाथ में जिसके
डोलपाती
तू मतलब का मूसल रे
तेरी पाती मिली
दरोगा जी
नौबजिया फूल
बाल मजदूर
बालकनी में
बेहतर दिन
यह तो देखिए
रोटी की चाह
वादों की मुरली

सजन तुम आ जाओ
हे कुर्सी महरानी

संकलन में-
नया साल- एक नया पल आए
        - हो मंगलमय यह वर्ष नया
फागुन- आझूलें बाहों में
दीप धरो- ये कैसी उजियारी है
नयनन में नंदलाल- तुम्हीं ने
होली है- फागुन की अगुआई में
हरसिंगार- हरसे हरसिंगार सखी

 

दरोगा जी

दुष्कर्मी की बस इतनी सी
है पहचान दरोगाजी

कोट कचहरी थाने में
जब जब जिससे फरियाद किया
चुटकी ले लेकर सबने
हमसे फूहड़ संवाद किया
किश्तों में लूटा सबने
अस्मत का थान दरोगाजी

जिनके जितने श्वेत लबादे
वो उतने ही जाली हैं
सूरत से सब संत मगर
दिल से चमचोर मवाली हैं
जाऊँ किसके पास बचाने
अपनी आन दरोगाजी

और न पूछो साहिब हमसे
हुलिया उसके बारे में
दम है तो पकड़ो बैठा है
संसद के गलियारे में
संत, सभासद हो चाहे
मुंशी दरबान दरोगाजी

जबसे मेरे शीलहरण का
शोर हुआ है खबरों में
तबसे मैं बदनाम हुई
दिनरात जहाँ की नजरों में
मारे हैं सब देख मुझे
तिरछी मुस्कान दरोगाजी

होता यह दुष्कर्म समझ लो
संग तेरे घरवालों के
तीर चलाते उनपर भी क्या
तुम अश्लील सवालों के
करते क्या तफ्तीश दबाकर
मुँह में पान दरोगाजी

१५ नवंबर २०१५

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