अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

हरसे हरसिंगार सखी

 

रतिया उनकी, बतिया सुनके
हरसे हरसिंगार सखी

यादों की
अमराई महकी, वादों के गुंजार उठे
पुरवाई की धुन पर जाने मन में
कितने ज्वार उठे मैं डूबी उतराई
जैसे नइया बिन
पतवार सखी

हरियर हरियर
दूब हुई अब सेज खुले अंबर नीचे
नेह बदरिया हुलस हुलस कर
प्यासे तन तरुवर सींचे खिलखिल कर
लोटे धरती पर सपनों के
कचनार सखी

बरसों बीते
रीते रीते अब जो पिया के संग हुई
कोरी चुनरिया पल में उनके
छूते ही सतरंग हुई
सांसे डोलीं अंदर बाहर बनके
वन्दनवार सखी

शंभु शरण मंडल
१८ जून २०१२

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter