अनुभूति में अश्विनी
कुमार विष्णु
की रचनाएँ—
नयी रचनाओं में-
दुबारा वतन
नहीं गिरता
नहीं थी फिर तमन्ना
बात बिगड़ी जो बनाऊँ
शोलों से खेलना
छंदमुक्त में-
ऊँचाई
घर
जलस्तर
थकन
वन देवता
हाइकु में-
बारह हाइकु मौसम के नाम
गीतों में-
चंदा मामा
रहो न अब यों
चलना पथ पाना है
तटबन्धों-का टूटना
मन की पहरेदारी में
मेघ से कह दो
अंजुमन में-
टूटे-फूटे घर में
फ़ुर्सत मिले तो
बिना मौसम
शहर में
संकलन में-
नयनन में नंदलाल-
प्रभुकुंज बिहारी
नया साल-
नया क्या साल में है
ममतामयी-
जय अम्बिके
विजयपर्वी-
आशाएँ फलने को विजयपर्व कहता चल
पिंजरे का तोता
होली है-
फागुन की पहली पगचाप
हरसिंगार-
मन हरसिंगार
|
|
दुबारा वतन
लूँ जन्म तो यही हो दुबारा वतन
मेरी आँखों का सबसे दुलारा वतन
हक़ से माँगूँ तो दे दे मुझे हर ख़ुशी
मैं जो चाहूँ बजे एकतारा वतन
आँसुओं की झड़ी आँख में हो नहीं
हर किसी को मिले हक़ का सारा वतन
हो वे औकात बाहर कभी माँगना
देगा तुमको जवाबें करारा वतन
आबरू की हमी तो हैं रखवाले अब
जान देने की ठानी सितारा वतन
दुश्मनों की हवा थोड़ी कमजोर है
और पानी को रोका हमारा वतन
अब इसी की ख़ुशी में तलाशो ख़ुशी
हर तरक्की की देगा इशारा वतन
१ जुलाई २०२५ |