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अनुभूति में
डॉ.
मधु प्रधान की रचनाएँ-
नयी रचनाओं में-
अरी चेतना
उसका खत आया
खिल गयी है सुबह
चुप रहना
समय मछेरा
दोहों में-
अन्तर में मीरा बसी
गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
इतनी पीड़ा
गीत गाने के लिये भी
चंदन हम तो बन जाएँगे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में
प्रीत की पाँखुरी
प्यासी हिरनी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
लौटा दो मेरे गाँव गली
सुमन जो मन
में बसाए
सुलग रही फूलों की घाटी
अंजुमन में-
चुपके चुपके
जिंदगी मीठी गजल है
जुगनुओं की तरह
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
बैठे हैं हम आज अकेले
लबों पर मुस्कान
वो लम्हा
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समय मछेरा
समय मछेरा जाल बिछाये
ताक रहा है लहर-लहर को
पलटा जब मन के पृष्ठों को
भीगे-भीगे आखर पाये
कुछ कहने की कोशिश की
कुछ मन में ही रहे छिपाये
रहो मौन अभिशाप मिला है
शायद कँपते हुये अधर को
ठहरी हुई झील सा जीवन
श्वांस-श्वांस है उन्मन-उन्मन
मधुरस पागे बयन खो गये
मंद हो गया हृद-स्पन्दन
मुस्कानों के लेप लगा कर
अक्सर पीना पड़ा ज़हर को
जीवन की आपा-धापी में
छलकी ढुरकी उमर गगरिया
फिसल गई कब कहाँ न जाने
हाथों से वह सोन मछरिया
कोई साथ चले या छूटे
वक्त ठहरता नहीं पहर को
गतिमयता जीवन का परिचय
चरण-चरण पर आलोड़ित लय
जीवन के इस रंगमंच पर
साँझ -भोर सुख-दुख का अभिनय
चाँद-सूर्य की आँख मिचौली
आमंत्रण दे नई सहर को
१ जुलाई २०२५ |