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अनुभूति में
डॉ.
मधु प्रधान की रचनाएँ-
नई रचनाओं में-
अरी चेतना
उसका खत आया
खिल गयी है सुबह
चुप रहना
समय मछेरा
दोहों में-
अन्तर में मीरा बसी
गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
इतनी पीड़ा
गीत गाने के लिये भी
चंदन हम तो बन जाएँगे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में
प्रीत की पाँखुरी
प्यासी हिरनी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
लौटा दो मेरे गाँव गली
सुमन जो मन
में बसाए
सुलग रही फूलों की घाटी
अंजुमन में-
चुपके चुपके
जिंदगी मीठी गजल है
जुगनुओं की तरह
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
बैठे हैं हम आज अकेले
लबों पर मुस्कान
वो लम्हा
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खिल गयी है सुबह
खिल गयी है सुबह
मीठे गीत गाए
चहकती चंचल चिरैया
चलो उड़ कर
आज फिर आकाश छूलें
कुहासे की परत पिघली
चाँदनी भी ढल गई है
बहुत रोई रात भर चकवी
पिया से मिल गई है
चोंच में कुहरा दबाये
उड़ रही चंचल चिरैया
रात ने कुछ-कुछ
सताया उसे भूलें
गुनगुनी सी धूप/मन
सहला रही है
और हँस कर नव कली
कुछ कान में बतला रही है
सहजता, विश्वास
धागे बुन रही चंचल चिरैया
खुल रही हैं
द्वार की वह जमी चूलें
जुलाई २०२५ |