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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ-

नए गीतों में-
कुशलता है
भटक गया तो
वह हथेली
क्षण का विछोह
क्षतिपूर्तियाँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतों में -
अब नहीं हो
असमय आए
इक तेरी चाहत में
उमर में डूब जाओ
एकांतवास

तपन न होती
तुम चाहो
प्रीत भरी हो
मन अजंता
मीरा हो पाती
मुझको पुकार
रिमझिम जैसी
लाज ना रहे

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप 

 

तपन न होती

स्मृतियों के हलाहल को
आँखों के खारे पानी से
काश कि गीत नहीं लिखता मैं
पीड़ाएँ निर्वसन न होतीं!

अब तक जाने क्या था मैं औ'
अब जाने क्या हो बैठा हूँ
ऐसा गीत दिया तुमने की
मैं अपना स्वर खो बैठा हूँ
अपयश की ओढ़े चादरिया
हुई कामना हर इक जोगी
काश प्रीत में बिका न होता
उम्र मेरी यों रेहन न होती!

तुझको क्षण-भर पाकर, चन्दन
हो गई थी तन की मधुशाला
अब जाने कब पूजा होगी
अब जाने कब मिले शिवाला
देखो साथ निभाए कब तक
गंध प्रतीक्षा के फूलों की
तेरी याद नहीं जलती तो
जिगर में मेरे तपन न होती!

जलन, माँगकर दीप ले गए
चुभन, बबूलों को है बाँटा
जब जीवन के चुने सफों पर
नाम तुम्हारा, लिख-लिख काटा
पनघट से मरघट ले आया
ढो अपने पाँवों पर मिट्टी
तुम अपना दामन धर देते
अर्थी ये बिन कफन न होती!

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