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अनुभूति में अभिज्ञात की रचनाएँ-

नए गीतों में-
कुशलता है
भटक गया तो
वह हथेली
क्षण का विछोह
क्षतिपूर्तियाँ

अंजुमन में -
आइना होता
तराशा उसने
दरमियाँ
रुक जाओ
वो रात
सँवारा होता
सिलसिला रखिए
पा नहीं सकते

कविताओं में -
अदृश्य दुभाषिया

आवारा हवाओं के खिलाफ़ चुपचाप
शब्द पहाड़ नहीं तोड़ते
तुमसे
हवाले गणितज्ञों के
होने सा होना

गीतों में -
अब नहीं हो
असमय आए
इक तेरी चाहत में
उमर में डूब जाओ
एकांतवास

तपन न होती
तुम चाहो
प्रीत भरी हो
मन अजंता
मीरा हो पाती
मुझको पुकार
रिमझिम जैसी
लाज ना रहे

संकलन में -
प्रेमगीत-
आख़िरी हिलोर तक
गुच्छे भर अमलतास-
धूप

 

प्रीत भरी हो

स्नेह सुधा चख हमने जाना
ममता का तुम खुला खजाना
बुझ जाएगी जग की तृष्णा
प्रियतम इतनी प्रीत भरी हो!

इतना दिया मुझे तुमने की
मेरी झोली अदनी ठहरी
तुमने प्यास बुझा दी इतनी
भीग गई मन की दोपहरी
सम्बल रीत गया था मेरा
ऐसे में आ तुमने टेरा
अब अभियान सफल मेरे सब
सचमुच तुम तो जीत भरी हो!

अब मेरी साँसों की वीणा
के सारे सुर सध जाएँगे
मुक्त कर दिया इतना तुमने
हम अकुला कर बँध जाएँगे
जीवन की तुमसे परिभाषा
तुम मेरी सारी अभिलाषा
शुष्क समर्पण मेरा लेकिन
तुम तो मधुमय गीत भरी हो!

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