अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अनुभूति में नीरज कुमार नीर की रचनाएँ-

नई रचनाओं में-
द्रविड़ देश में बारिश
प्रेम में
मुक्ति
विस्मृति

छंदमुक्त में-
अवतार अब जरूरी है
औरत और नदी
उड़ो तुम
काला रंग
जन गण मन के अधिनायक
जहरीली शराब
दीया और चाँद
न जाने कब चाँद निकलेगा
परंपरा
सपने और रोटियाँ
सुख का सूरज
सुखद स्मृतियाँ

स्मृति
हर्ष और विषाद

 

विस्मृति

लंबे छरहरे पिता
बुढ़ापे के भार से झुक गए थे।
टेढ़ी हो गयी थी
हमेशा तनी रहने वाली उनकी रीढ़
लेकिन बोली में कभी नहीं आया था
लरजपन
मृत्यु को अँगूठा दिखाकर
कई बार हँसते हुए वापस लौटे थे पिता
जैसे मृत्यु का घर उनका ससुराल हो

सफेद धोती, कलफदार कुर्ता, मुँह में पान
और बड़ी सी मुस्कान के साथ
याद आ जाते हैं पिता बरबस ही
माँ की सीधई और पिता की संतई की चर्चा
अब भी करते हैं
उन्हें जानने वाले

सोचता हूँ
किस तरह याद किया जाऊँगा मैं
यहाँ से जाने के बाद
स्मृतियों की खुरची हुई सतह पर
कैसा बनेगा मेरा चेहरा
या कि मिट्टी के टूटे हुए घड़े के साथ ही
बहा दिया जाऊँगा अश्वत्थ की जड़ों में
कर दिया जाऊँगा विस्मृत
दिवाली के बुझे दीयों की तरह

घहराते जीवन नद का शोर
बढ़ जाता है
गहराती रात्रि की विषम बेला में
स्वर्ग का विचार
बहुत ही बोरियत भरा ख्याल है
मैं जन्नत के बजाए
रहना चाहता हूँ
अपने बच्चों की स्मृतियों में
चॉकलेट के मीठे स्वाद की तरह।

पर मेरे चाहने भर से क्या होता है

१ जुलाई २०२३

 

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter