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अभिव्यक्ति तुक-कोश 

१. ७. २०२४1

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गरम पकौड़े

 

 

आज बनेंगे गरम पकौड़े चार बजे
घर आना जी

ऊब उदासी छोड़ कली से चटक फूल से खिले नहीं
अरसा हुआ शहर में रहते हम सब कब से मिले नहीं
यादों की बारातें लेकर महफिल में
छा जाना जी

भागम भाग लगी जीवन में दो पल कहीं सुकून मिले
इसके बाद चलेंगे मूवी वह जो कल ही हुई रिले
पास यहीं पर नदिया बहती चलकर
वहाँ नहाना जी

भोला भाला कालू अपना हीरे का व्यापारी है
था किताब का कीड़ा मोहन कहीं बड़ा अधिकारी है
मिलकर याद करेंगे फिर से
गुजरा हुआ जमाना जी

मोटी रानी चश्में वाली अब भी बहुत तुनकती है
झेला करती मार समय की मन को बहुत धुनकती है
थोड़ा धीरज उस पगली को मिककर
हमें बँधाना जी

पचपन में हम बचपन वाले दिन लौटाने वाले है
पहले भी हम लोग अलग थे अब भी बड़े निराले हैं
मिलकर साथ करेंगे भोजन रात
यहीं सो जाना जी

- मनोज जैन मधुर

इस माह
(गरम पकौड़े विशेषांक में)

गीतों में-

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आकुल

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ऋताशेखर मधु

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ओमप्रकाश नौटियाल

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गरिमा सक्सेना

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जिज्ञासा सिंह

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धर्मेन्द्र कुमार सिंह

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निशा कोठारी

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प्रभुदयाल श्रीवास्तव

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पूर्णिमा वर्मन

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मंजुलता श्रीवास्तव

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मधु संधु

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मनोज जैन मधुर

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राहुल शिवाय

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विश्वम्भर शुक्ल

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शरद तैलंग

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शैलेश गुप्त वीर

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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

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सुधा देवरानी

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सुरेन्द्रपाल वैद्य

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दोहे और कुंडलिया में-

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अनिता सुधीर आख्या

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उमाप्रसाद लोधी

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मंजु गुप्ता

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संजीव सलिल

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सुधा आचार्य

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अंजुमन में-

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आभा सक्सेना दूनवी

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परमजीत कौर रीत

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रमा प्रवीर वर्मा

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विनीता तिवारी

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छंदमुक्त में-

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मंजुल भटनागर

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सूर्यकांत त्रिपाठी निराला

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