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ऋतु वसंत पुष्प पुष्प भँवरों
के पहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे
कह दो कि
चिड़ियों के कलरव को सुन ले
कह दो कि
मन के कुछ भँवरों से मिल ले
कह दो कि रंग अभी बिखरा नहीं हैं
होली का पर्व अभी निखरा नहीं है
रुको अभी डगर-डगर सुख-समंद लहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे
कह दो कि
सरसों की पंखुरियाँ गिन ले
कह दो कि
तितली से माँग एक दिन ले
देखो तो अमलतास सजा तक नहीं
देखो ढप-मंजीरा बजा तक नहीं
रुको अभी गलियों गुलाल उड़ें गहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे
ठहरो कि
यह मौसम फागुन से भर ले
उत्सव का पागलपन बाँध यह शहर ले
भीड़
अभी घरों से निकली तक नहीं
'होली है'
यह पुकार मचली तक नहीं
रुको ज़रा धूप के तीर हों सुनहरे
मारुत से कह दो
कुछ और देर ठहरे
- पूर्णिमा वर्मन |