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ओस भीगी गुलमुहर की छिटकियों के दिन
चैत्र डूबी रंग वाली पत्तियों
के दिन
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कुछ बड़ी कविताएँ सूरज लिख रहा है
पढ़ रहा उनको उजाला दिख रहा है
एक तितली फिर उड़ानों में मगन है
और उपवन चुप, खयालों में गगन है
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गुनगुनी-सी धूप वाली खिड़कियों के दिन
चैत्र झरती नीम वाली
सुस्तियों के दिन
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भोर--की--बेला--रसीली--कोयलें--गातीं
मंजरी की गंध लेकर टोलियाँ आतीं
फिर दिशाओं में मलय-वन की गजल है
हर किरन पर इक सुनहरी-सी लहर है
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अमलतासों में बसंती झुमकियों के दिन
चैत्र दहते टेसुओं की
चिट्ठियों के दिन
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- पूर्णिमा वर्मन |