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होली खेल लूँ
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अगर दे दो मुझे थोड़ी इजाज़त तो मैं होली खेल लूँ
तुम्हें भी हो अगर रंगों की चाहत तो मैं होली खेल लूँ

हमेशा ही तुम्हें सम्मान की नज़रों से देखा है सनम
मगर अब दिल कहे कर लूँ शरारत तो मैं होली खेल लूँ

बहुत नफ़रत का बनता जा रहा माहौल दुनिया में अभी
ये इक त्योहार है जिसमें मुहब्बत तो मैं होली खेल लूँ

गिले शिकवे भी सारे दूर हो जाते हैं जब मिलते गले
जो मुझ पर भी हो थोड़ी सी इनायत तो मैं होली खेल लूँ

जवां बच्चों बड़े छोटे का मिट जाता है इस दिन भेद भी
निभानी हो अगर ऐसी रिवायत तो मैं होली खेल लूँ

गज़ब उल्ल्हास मस्ती का ‘शरद' वातावरण है हर तरफ़
जो इससे पहले आए कोई आफ़त तो मैं होली खेल लूँ
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- शरद तैलंग 
१ मार्च २०२६

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