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    चढ़ा फगुनवा
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मन का ताप रहे तो बस में
चढ़ा फगुनवा
पर नस-नस में !

शिरा-धमनियों में रस बहता
रोम-रोम तन
झर-झर पुलके
आम्रकुंज-मन मौन रमा था
गद-गद मंजर भर-भर बहके
सुर पछुआ का लगना बाकी
चढ़ा फगुनवा
पर नस-नस में

देह-धरा है सरसों-सरसों
खेत-खेत
गेहूँ पक आये
रुचे न चुपके चना खोंटना
गठे पुष्ट दाने मन भाये
बिछूआ-काटा भी जल माँगे
चढ़ा फगुनवा
पर नस-नस में

कोइलिया टेसू को खुल कर
महुआ-महुआ
उकसाती है
बढ़े मास की धौंस नहीं अब
सिहरन मौसम की भाती है
फेर नजर कर काबू तन-मन
चढ़ा फगुनवा
पर नस-नस में

- सौरभ पाण्डेय  
१ मार्च २०२६

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