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    फीके मालपुए हैं
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आँगन में सन्नाटा पसरा
रोयी दादी की अलमारी
जैसे के तैसे रक्खे हैं
लाये हुए रंग-पिचकारी

पिछली बरस ख़ूब भीगा था
पोते सँग यह पूरा ही घर
नर्म हथेली के छापों से
ख़ुश थीं दीवारें इतराकर
बुझा-बुझा त्योहार रह गया
धरी रह गयी हर तैयारी

मावा चीनी सब डाला था
लेकिन मालपुए फीके हैं
खोज रहा है स्नेह भाल को
थाली में गुमसुम टीके हैं
लौटे नहीं प्रवासी बच्चे
घर की खोई रंगत सारी

चार दिवस बाबा-दादी को
मुश्किल से ही मिल पाते थे
जिसमें अपना स्नेह लुटाकर
वे ख़ुशियों से भर जाते थे
अब किससे क्या कहें एक पल
सौ-सौ वर्षों पर है भारी

- राहुल शिवाय  
१ मार्च २०२६

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