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      फागुन रुत
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छेड़ रही फागुन रुत
वैरागी मन इत-उत

ओढ़ी साफ सफेद चदरिया
डाल गया कोई रंग की छिटकी
हो गई जोगन भी बावरिया
श्वासों की गति द्रुत

मन मसान भभूत रमाये
भीग गया टेसू के रंग में
अबरक और अबीर जमाए
भंग-सा नशा धुत

छूट गया बैरागी चोला
रंग फुहार चलीं जब सर-सर
दिल बेचारा डगमग डोला
रचा नया कोई श्रुत

- पूर्णिमा जोशी
१ मार्च २०२६

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