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होली खेल लूँ
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कहेगा फाग जब हँसकर, तभी होली मनाएँगे
चले आएँगे जब नटवर, तभी होली मनाएँगे

नगाड़े, झाँझ, ढोलक, चंग जब मस्ती में झूमेंगे
थिरकने जब लगे अम्बर, तभी होली मनाएँगे

दिखावे को गले मिलकर, करें क्यों रस्म ये पूरी
गुलाबी होगा जब मंज़र, तभी होली मनाएँगे

चहकता-झूमता फिरता था कल तक तो यही फागुन
ये फागुन होगा जब ख़ुशतर, तभी होली मनाएँगे

गुलालों में कहाँ अब प्रीत की ख़ुशबू महकती है
उढ़ाएगा प्रणय चूनर, तभी होली मनाएँगे

कहीं मज़हब, कहीं भाषा, कहीं वर्णों के झगड़े हैं
गिरा देंगे सभी ख़ंजर, तभी होली मनाएँगे

वो ज़िद पर अड़ गए हैं, अब उन्हें कैसे मनाएँ हम
बुलाएँगे जो ख़ुद हँसकर, तभी होली मनाएँगे
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- डा सीमा विजयवर्गीय
१ मार्च २०२६

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