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  उतर आया फागुन
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फागुन में मौसम लगता है
जैसे रंगों भरा कटोरा

हरे गुलाबी नीले पीले
कुछ सोने जैसे चमकीले
आसमान पर छा जाते हैं
कुछ फीके से कुछ चमकीले

कितना हाथ छुड़ाना चाहें
बारी-बारी सबने बोरा

खेतों की हरियाली जैसे
पके धान की बाली जैसे
कभी साँवले आसमान पर
खिली धूप की लाली जैसे

बाद हवन के ज्यों कलाई में
बंधा कलावे का हो डोरा

कभी ताल में खिले कमल से
कभी तृषातुर को मृगजल से
खिली कटैया के फूलों से
लहराते नद के कूलों से

तन से लिपटे रंग हजारों
फिर भी मन कोरा का कोरा
.
- डॉ मधु प्रधान
१ मार्च २०२६

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