अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

 

                        .
             
     होली
  .
रंग और पिचकारी
देखते ही
बचपन याद आ रहा है
बच्चों की धमाचौकड़ी
रंग और पानी
मन को लुभा रहा है

गली-गली
उड़ रहा है गुलाल
और हवा भी रंगीन हो रही है
भीगे सपनों की चुनरिया
जैसे फिर से नई हो रही है

टेसू के फूलों सा
रंगीन हो गया है आँगन
छोटे-छोटे हाथों में
जैसे खिल गया है बचपन
न कोई ऊँच नीच है न मन में दीवार
रंगों ने होली पर सबको
कर दिया है एकाकार

आज
वही पिचकारी
अलमारी में सोई पड़ी है
पर मन की कोरी दीवार
अब भी रंगों को ढूँढ रही है

चलो फिर से
भीग चलें रंगों की फुहारों में
उम्र को कुछ कम कर लें
उन मासूम बरसातों में

- संजय सुजय बासल
१ मार्च २०२६

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter