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तेरे बोल

तेरे बोल से निकले तूफ़ानों ने
ऊधम मचाए बहुत
मुँह फुलाकर
जहाँ से मुड़ गई
उजली चाँदनी
लम्बे केशों सी
स्याह पड़ गई

तू कल ही तो
बतिया रही थी
खूसट ऐरेगैरों से
और खिल उठी थी मेरे
मन की मुरझाई लता
जब तूने बीच में ही मोड़ दी
शीतल धार मेरी ओर
कितनी मनुहार भरी!
कलकल नदी सी बहती
जिसके उपर
तू उमंग में भर कर
फुदक रही थी
एक रंगीन चिड़िया की तरह
इन बाहों की सी
टहनियों पर
चेहरे पर चटकीले रंग देख कर
मैं मुस्काया, पुलकित भी हुआ
कि
फिर अचानक दो लाल वेषधारी
होंठों के पीछे से
बत्तीस की टीम का हुआ हमला
मेरे दिमाग की नसों को ऐसा दबोचा
कि झटका खा गई
हौसलों की दीवारें।

१ मई २०२२

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