अनुभूति में श्रीकांत सक्सेना की रचनाएँ-
नई रचनाओं में- इंतजार कमीज कि तुम बड़े हो क्यों मन चाहता है जिंदगी मुझे नहीं मालूम समूह का चक्रव्यूह
छंदमुक्त में- जिन्दा हो बाजार बेटी भीतर कोई है सुबह खुल रही है फिर से सुरक्षा
कि तुन बड़े हो
खोकर अपना स्व, गँवाकर सबकुछ अपना वैभव के जिस निजी शिखर पर खड़े हुए हो निपट अकेले खोखली मुस्कराहटों गंधियाते मन सत्ता के उच्छिष्ट की असह्य दुर्गंध नाक आँख सब बंद किए तुम इसी भ्रम में अड़े खड़े हो कि तुम बड़े हो ३० जनवरी २०१२
इस रचना पर अपने विचार लिखें दूसरों के विचार पढ़ें
अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति
© सर्वाधिकार सुरक्षित अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है