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अनुभूति में महेंद्र भटनागर की रचनाएँ

छंदमुक्त में-
अभिलषित
आसक्ति
गौरैया
पाताल पानी की उपत्यका से

गीतों में-
उत्सर्ग
एक दिन
जीने के लिए
दीपक
धन्यवाद
बस तुम्हारी याद
भीगी भीगी भारी रात

शुभैषी
सहसा
यह न समझो

कविताओं में-
आस्था
ओ भवितव्य के अश्वों!

 

पातालपानी की उपत्यका से

तुम्हारे अंक में
विश्रांति पाने आ गया
भटका प्रवासी
मैं !

अनावृत वक्ष-ढालों पर
सहज उतरूँ
सबल चट्टान रूपी बाँह दो,
शीतल अतल-की छाँह दो !

तप्त अधरों को
सरस जलधार का
सुख-स्पर्श दो,
युग मूक
मन को हर्ष दो,

अतृप्त
आत्मा को सुखद
अनुराग-संगम बोध दो !
एकांत में
कल-कल मधुर संगीत से
दो
स्वप्न का अधिवास बहुरंगी,
ओ गहन घाटी !
आ गया हूँ मैं
तुम्हारा प्राण
चिर-संगी !

कुछ क्षणों को बाँध लूँ
अल्हड़ तुम्हारी धार से
बेबस उमड़ती भावना का ज्वार !
फिर इस जन्म में
इस ओर
आना हो, न हो !

क्या मुझ प्रवासी का
नहीं इतना तनिक अधिकार
छोड़ जाऊँ जो
प्यार सूचक
चिह्न ही
दो ..
चार .... ?

१७ सितंबर २०१२

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