अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में शैलेन्द्र चौहान की
रचनाएँ -

नई कविताएँ-
कबीर बड़
काँपते हुए
जघन्यतम
लोअर परेल

कविताओं में-
आषाढ़ बीतने पर
एक घटना
एक वृत्तचित्र: स्वतंत्रता दिवस की पूर्व-संध्या पर
क्या हम नहीं कर सकते कुछ भी
कोंडबा
चिड़िया और कवि
जीवन संगिनी

तबादला
थार का जीवट
पतंग आकाश में
भद्रावती
मूर्ख
लैंडस्केप
शब्द नहीं झरते
स्त्री प्रश्न
सुबह के भूले

संकलन में
गुच्छे भर अमलतास-मरुधरा
                -आतप
                -विरक्ति

  कबीर बड़

बड़ी
तुम्हारी आत्मा की पहचान
ताँत, तुम्हारी रगें
तन, रबाब
अभिन्न
परमात्मा और तुम
हम कैसे पहचानें
नर्मदा इस पार
था न, कबीर बड
हैं मंदिर में विराजे
राम
पार धार
हनुमान
नाव, नदी बीच
बड का पेड़ मुस्तैद
छाता ताने मंदिर पर
भक्त, गाते-नाचते
मौज में
खाते खूब
पिकनिक का आनंद बहुत
लहरों के साथ
झिलमिलाती है
कबीर दास की आकृति
नर्मदा प्रवाह में
कोई कैसे सुने
विरहा
और तुम्हारे व
साईं बीच
अकथ संवाद।

२ जून २००८

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter