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गुच्छे भर अमलतास-मरुधरा
                -आतप
                -विरक्ति

  चिड़िया और कवि

कविता में चिड़िया
चिड़िया में कविता

आजकल कविता फुदकती है
शिल्प के स्तर पर
रचनाकार चिचियाता है चूँ-चूँ
कविता कुछ नहीं कहती
क्यों?

आदमी जुड़ता धरती से
धरती उगलती सोना
लोग चहलकदमी करते हैं
भागमभाग ज़िंदगी

आदमी उड़ता आसमान में
गिर जाता खाई में
वह कुछ नहीं करता
जो करता है बेफिजूल

रोज़ रचता है नए-नए व्यूह
कुचलता इंसानियत को
रौंदता आदमी को
प्रश्न सहज है
जवाब उससे भी आसान

जब होते हैं हम कवि
तब आदमी नहीं होते
जब करते हैं बात
कलुआ, रमुआ, सुखिया, होरी की
कोरी, चमार और अघोरी की
तब हम बहुत दूर होते हैं
उन स्थितियों, परिस्थितियों एवं
संस्थितियों से

और
जब हम बात करते हैं
चिड़िया की
तो नहीं होते
उतने सहज,
उतने सरल
एवं स्वच्छंद

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