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अनुभूति में रविशंकर की रचनाएँ —

नए गीत-
अनुवाद हुई ज़िंदगी
एक विमूढ़ सदी
खो गई आशा
गाँव और घर का भूगोल
जल रहा है मन
बीते दिन खोए दिन
हम शब्दों के सौदागर हैं

अंजुमन में-
ग़ज़ल

कविताओं में
इस अंधड़ में 

पौ फटते ही

गीतों में-
एक अदद भूल
गहराता है एक कुहासा
पाती परदेशी की
भाग रहे हैं लोग सभी
ये अपने पल
हम अगस्त्य के वंशज

संकलन में- 
गाँव में अलाव – दिन गाढ़े के आए 
प्रेमगीत – यह सम्मान
गुच्छे भर अमलतास – जेठ आया

 

ये अपने पल

ये अपने
बेहद अपने पल
क्यों इतने बेगाने बीते।

एड़ी से चोटी तक कैसा
टँगा हुआ है
एक अपरिचय,
दस्तक देता
दरवाज़ों पर
शंकाओं संदेहों का भय,
भीड़ भरे इस महाद्वीप को
हम बतौर क्रूसों हैं जीते।

साँसों का विनिमय
आलिंगन
और वेदना की
कुछ बूँदें,
नर्म छुवन की
गरमाहट को
याद करें हम
आँखें मूँदे,
हिरनों की छलाँग वाले दिन
अब अपंग लावारिस रीते।

छालों भरा सफ़र एकाकी
जुआ ज़िंदगी का है काँधे,
मन फिर भी
परिचित आहट के
इंतज़ार में हिम्मत बाँधे,
समा गई
पगध्वनि सुरंग में
अवसादों के
बिछे पलीते।

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