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एहतियात
गतिमान ज़िंदगी
घर लौटने पर
डरे हुए लोग
नहाती हुई लड़की
पहला सबक
बच्चे के बड़ा होने तक
बयान
मेरे ख्वाब
लड़कियाँ उदास हैं
हैरतंगेज़
रेलवे प्लेटफ़ार्म

 

गतिमान ज़िंदगी

गगनचुंबी इमारतों से आच्छादित
कांक्रीट के निरंतर विस्तार लेते जंगल में
सतरहवीं मंज़िल पर बैठी फाख्त़ा की
अनथक मनुहार जारी है
इस विश्वास के साथ
कि उसकी यह गुहार
अवश्य सुन लेगा
उसका भटका हुआ साथी
देर या सवेर
उसकी यह आर्द पुकार
बन जाएगी एक नदी
जिस पर तिरता हुआ
चला आएगा
समय के अवरोधों के पार
उसके पास
लगभग उसी समय
उसी बालकनी के कोने में
गमले में लगे
थोड़ी-सी साफ हवा
और एक कतरा धूप को तरसते
पौधे पर लगी
एक कली कर रही है
फूल बनने की पुरज़ोर कोशिश
अपनी सुगंध के प्रसार
को आतुर
नन्ही-सी फाख़्ता की पुकार
और कली के संघर्ष में है
एक जिजीविषा
जिसके चलते दुनिया में
बची है अभी तक इतनी जगह
जहाँ अवशेष हैं
ज़िंदगी के गतिमान रहने के
तमाम अपरिहार्य कारण।

२५ फ़रवरी २००८

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