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अनुभूति में रोहित रूसिया की रचनाएँ-

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एक पंछी ढूँढता है
क्या कहें क्या ना कहें
जब भी लिखना जो भी लिखना
प्रेम में भीगे हुए कुछ फूल

सिकुड़ गई क्यों

गीतों में-
अब नहीं आतीं
एक तिनके का सहारा
नदी की धार सी संवेदनाएँ
बाहर आलीशान
मेरा छूट गया गाँव
है कौन जो भीतर रहता है

 

एक तिनके का सहारा

सूखती आँखों की पलकें ढूढती हैं
एक तिनके का सहारा

झुक गए अरमान सारे
एक डाली बोझ की क्या आ गयी
भूल बैठे खुद को भी
कैसी ये अंधियारि इतनी छा गयी
कौन भीतर
कर रहा इतना जतन
उठ जाऊँ मैं फिर से दुबारा

सूखती आँखों की पलकें
ढूढती हैं एक तिनके का सहारा

बज रहा है गीत कोई
हाँ निरंतर गूँजता है कान में
एक मुसाफिर है भटकता
जूझता है मेरे ही मन - प्राण में
हो गए
सब पार मेरा हाथ थामे
पर नहीं पाता मैं खुद से ही किनारा

सूखती आँखों की पलकें
ढूढती हैं एक तिनके का सहारा

२९ अक्तूबर २०१२

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

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