अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में परमजीत कौर रीत की रचनाएँ

नयी रचनाओं में-
अँधेरों की फ़ितरत
एक अकेले पर
कहाँ कोई किसी से
दिल से मिलिए
साथ चलना है

क्षणिकाओं में-
रिक्त स्थान- चार क्षणिकाएँ

माहिया में-
खुश्बू का हरकारा

अंजुमन में-
कहीं आँखों का सागर
कहीं मुश्किल
कोई दावे की खातिर
रोटी या फूलों के सपने
हिज्र में भी गुलाब

माहियों में-
माहिये

 

अँधेरों की फ़ितरत

अँधेरों की फ़ितरत को क्या कीजिए
चिराग़ों का क़द ही बढ़ा लीजिए

ये दर-अस्ल है ज़िन्दगी का सुकूं
दुआ लीजिए और दुआ दीजिए

ये ही नफ़रतों का करेंगी इलाज़
जड़ी-बूटियाँ प्यार की लीजिए

समुन्दर के जैसी है गर तिश्नगी
न कम होगी, सौ-सौ नदी पीजिए

खुदा ! ये दुआ है, करूँ बंदगी
भले मुझको कम ज़िन्दगी दीजिए

१ अक्टूबर २०२३

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter