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नई रचनाओं में-
अरी चेतना
उसका खत आया
खिल गयी है सुबह
चुप रहना
समय मछेरा

दोहों में-
अन्तर में मीरा बसी

गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
इतनी पीड़ा
गीत गाने के लिये भी
चंदन हम तो बन जाएँगे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में
प्रीत की पाँखुरी
प्यासी हिरनी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
लौटा दो मेरे गाँव गली
सुमन जो मन में बसाए
सुलग रही फूलों की घाटी

अंजुमन में-
चुपके चुपके
जिंदगी मीठी गजल है
जुगनुओं की तरह
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
बैठे हैं हम आज अकेले
लबों पर मुस्कान

वो लम्हा

  गीत गाने के लिये

चुप रहना
बातें मन की मत कहना

बादल घुमड़ते हैं अन्तस में झरने दो
रीता है मन घट बस बूँद बूँद भरने दो
कोमलतम रेशों का
तिल-तिल हो कर दहना
मत कहना

पोखर की मौन शाम बेला संझवाती की
खोई वो आहट जी मन को महकाती थी
साधों के दीपक का
धार-धार हो बहना
मत कहना

कँपती बुनियादों का मौन संवादों का
बीत गया मौसम उन कसमों का वादों का
सपनों के शिखरों का
अनायास ही ढहना
मत कहना

१ जुलाई २०२५
 

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