अंजुमन। उपहार। काव्य संगम। गीत। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। पुराने अंक संकलन। अभिव्यक्ति। कुण्डलिया। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर

अनुभूति में डॉ. मधु प्रधान की रचनाएँ-

नये गीतों में-
आओ बैठें नदी किनारे
तुम क्या जानो
पीपल की छाँह में

प्यासी हिरनी
सुमन जो मन में बसाए

गीतों में-
प्रीत की पाँखुरी
मेरी है यह भूल अगर
रूठकर मत दूर जाना
सुलग रही फूलों की घाटी

अंजुमन में-
जहाँ तक नज़र
जेठ की दोपहर
नया शहर है
लबों पर मुस्कान

  सुलग रही फूलों की घाटी

सुलग रही
फूलों की घाटी
प्यासी हिरनी
सम्मुख मृग जल
कंपित पग पथराया मन है
बहुत उदास आज दर्पण है।

नीलकंठ
के पंख नोच कर
मस्त बाज कर रहे किलोलें
सहमी सहमी-सी गौरैया
छुपी छुपी
शाखों पर डोलें
कोटर पर
नागों का पहरा
नींद दूर है, दूर सपन है।

पके खेत
खलिहान जोहते
बाट कहाँ वंशी की तानें
कहाँ खो गई अल्हड़ कल-कल
झरने सी
झरती मुस्काने
उभर रहे
कुंठा के अंकुश
ठहरा ठहरा सा जीवन है।

बरस रही
है आग रात दिन
सुलग  रही  फूलों की घाटी
उडे पखेरु नीड़ छोड़ कर
स्वप्न हुई
देहरी की माटी
बिछ़़ड गई
कोपल डाली से,
सूना सूना घर आँगन है।

१३ दिसंबर २०१०

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमन। उपहार। काव्य चर्चा। काव्य संगम। किशोर कोना। गौरव ग्राम। गौरवग्रंथ। दोहे। रचनाएँ भेजें
नई हवा। पाठकनामा। पुराने अंक। संकलन। हाइकु। हास्य व्यंग्य। क्षणिकाएँ। दिशांतर। समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter