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अनुभूति में पराशर गौड़ की रचनाएँ—

छंदमुक्त में-
चाह
बहस
बिगुल बज उठा
सज़ा
सैनिक का आग्रह

हास्य व्यंग्य में-
अपनी सुना गया
गोष्ठी
पराशर गौड़ की सत्रह हँसिकाएँ
मुझे छोड़
शादी का इश्तेहार

संकलन में-
नया साल- नूतन वर्ष

शादी का इश्तेहार

मैं
अपनी शादी के चक्कर में
अपने रिशतेदारों ब्राह्मणों के घर
जाते जाते थक गया
उम्र ढलती जा रही थी
न कोइ संदेश
न कोई
रिश्ता ही आया

एक मित्र ने दी सलाह
क्यों भटक रहा दर–दर मेरे यार
अपनी शादी के लिए
अखबारों में दे इश्तेहार

सो दे डाला
‘एक सुन्दर सुशील टिकाऊ
जो नही है बिकाऊ के लिये
स्त्री चाहिए…’
कुछ दिनों के बाद
पत्र तो आये
महिलाओं के कम
पुरुषों के ज्यादा आए
खोल कर जब पढ़ा
सभी ने एक ही बात लिखी थी
कृपया हमारी ले जाइए

२४ मार्च २००४

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