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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

सभी को लुत्फ़ आता है

सभी को लुत्फ़ आता है पराये माल में जैसे।
लचकता चल रहा है हर कोई भोपाल में जैसे।।

हमारी लेखनी से काव्य की धारा यों चलती है।
कि बाबू भागता ऑफ़िस को आपात काल में जैसे।

हमारे दोस्त हमको देखकर नज़रें चुराते हैं।
कि घूँघट, डाल बीबी देखती ससुराल में जैसे।।

सभी रस काव्य में कुछ इस तरह हमने निचोड़े हैं।
ले पेटी इत्र की कोई चले रूमाल में जैसे।।

सभी छंदों को हमने बंधनों से मुक्त कर डाला।
कि महिलाएँ हुई उन्मुक्त महिला साल में जैसे।।

हर महफ़िल हमारा साथ पाकर यों महक जाती।
नमक ज़्यादा ज़रा-सा हो गया हो दाल में जैसे।।

नई नित कल्पना को हम सहजता से पकड़ते हैं।
कि कोई सोन मछली फँस तड़फती जाल में जैसे।।

हम हर विधा में दखल रखते हैं बराबर का।
कि सिक्के एक से ही ढल रहे टकसाल में जैसे।।

24 अगस्त 2006

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