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अनुभूति में सजीवन मयंक की
रचनाएँ -

नई ग़ज़लें-

एक दुश्मन
क्यों करते हो बात
मुझे चिढ़ा रहे हैं
यही सोचकर निकला

क्षणिकाओं में-
पाँच क्षणिकाएँ

अंजुमन में-
अजब यह माजरा देखा
अब आए बादल
आकाश साफ़ है
ज़िंदगी सिर्फ़ पानी रही
तूफ़ान से टकराते हैं
नचाते रहे पहले कठपुतलियाँ
भटक रहे हैं बाबू जी
याद आता है
सभी को लुत्फ़ आता है
हमको कोई गिला नहीं

कविताओं में-
जीवन क्या है
दीये का वक्तव्य

गीतों में-
अमावस का दर्द
असीम स्वर खटक रहे हैं
खेतों में जिनका देवालय
गीता हो रहीम के घर में
पथ के विंध्याचल

संकलन में-
मेरा भारत-
आज तिरंगा फहराता है शान से
माटी चंदन है
मातृभाषा के प्रति-
हिंदी ने हमको एक रखा
हिंदी में कितना अपनापन
जग का मेला-
बंदर मामा

 

एक दुश्मन

एक दुश्मन बहुत पुराना है।
जिसका अंदाज़ दोस्ताना है।।

कोई कश्ती नहीं किनारे पर।
हमें अब तैरकर ही जाना है।।

सारी दुनिया टटोल ली हमने।
अब खुदा को भी आज़माना है।।

कैद में जी रहा है जो पंछी।
उसे अब और क्या सताना है।।

हमने सूरज से दोस्ती कर ली।
किसी दिन साथ डूब जाना है।।

मौत के पास कौन जाता है।
एक दिन मौत को ही आना है।।

गीत ग़ज़लों की अलग है दुनिया।
इनका अपना अलग घराना है।।

बात दुनिया की सुनी है अब तक।
आज अपनी उसे सुनाना है।।

हमारा कौन बचा दुनिया में।
हमें अब किसकी कसम खाना है।।

हमें यायावर नहीं समझ लेना।
हमारे पास एक ठिकाना है।।

१६ मार्च २००९

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